ये कैसी कश्मकश में उलझ के रह गई है ज़िन्दगी,

ना कुछ कर पा रही हूं, ना समझ पा रही हूं,

बस हर वक़्त कुछ ना कुछ सोचे ही जा रही हूं,

भीतर का कोलाहल मेरे जहन को कचोट रहा है,

ना जाने कितनी बातों का सैलाब मन में उमड़ रहा है,

ना दिल दिमाग की सुनता है, ना दिमाग दिल की मानता है,

हर वक़्त बस एक अजीब पहेली चुनता है,

ना जाने किसका भय है, ना जाने किसका मोह है ,

मैं इस उधेड़बुन को समझना चाहती हूं,

कुछ कहना चाहती हूं, कुछ सुनना चाहती हूं,

कुछ पाना चाहती हूं, कुछ बातों का जवाब चाहती हूं,

मेरे ख्वाबों की उड़ान चाहती हूं, सपनों का मुकाम चाहती हूं,

मै खुद को समझना चाहतीं हूं और इस ज़िन्दगी को जीना चाहती हूं!

– Kriti @Brightway

Love & Peace to everyone !

You may also like some other self-musing Poetry :

See you soon with a new Brightway post…. Thank you for your valuable time, Keep connecting. Have a wonderful day and take care.   Till next time…

If you haven’t already, checkout my other recent posts –

Check out Brightway Gallery – Way to Bright